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    हायर एजुकेशन - महिलाएं क्लासरूम तक तो पहुंच गईं, लेकिन टॉप लेवल पर क्यों नहीं?
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    हायर एजुकेशन - महिलाएं क्लासरूम तक तो पहुंच गईं, लेकिन टॉप लेवल पर क्यों नहीं?

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    Maheshwer PeriUpdated on 26 Aug 2026, 10:55 AM IST
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    उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी, अर्थव्यवस्था और समाज में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बीते कुछ वर्षों के रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि हायर एजुकेशन में पुरुष छात्रों की तुलना में महिला छात्रों की भागीदारी बढ़ी है। यह ट्रेंड भारत में हायर एजुकेशन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और तरक्की को दिखाता है। हायर एजुकेशन के बाद, कई महिलाएं अच्छे संस्थानों में नौकरी या व्यवसाय आदि से जुड़ गई, लेकिन जब बात यूनिवर्सिटी और बड़े संस्थानों को चलाने वालों की आती है, तो यह तरक्की टॉप लेवल के पदों तक पहुंचने से पहले ही रुकी हुई दिखती है।

    हायर एजुकेशन - महिलाएं क्लासरूम तक तो पहुंच गईं, लेकिन टॉप लेवल पर क्यों नहीं?
    हायर एजुकेशन - महिलाएं क्लासरूम तक तो पहुंच गईं, लेकिन टॉप सीट पर क्यों नहीं?

    भारतीय शैक्षणिक कैंपस में महिलाओं की मौजूदगी अब मामूली नहीं रह गई है। वे बड़ी संख्या में स्टूडेंट, रिसर्चर, टीचर और एकेडमिक्स के तौर पर मौजूद हैं। लेकिन, एकेडमिक पदानुक्रम (hierarchy) में जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते हैं, महिलाओं की संख्या कम होती जाती है।

    यह लेख भारत के प्रमुख राज्यों में उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी (Women's participation in higher education) के स्तर की जांच करता है और हायर एजुकेशन जैसे आईआआईटी, एम्स, एनएलयू, जेएनयू, इग्नू जैसे संस्थानों में टॉप लेवल पोस्ट पर महिलाओं की स्थिति के कारणों का पता लगाता है। इसमें 2014 से 2024 तक उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी और परिवर्तन को बताने की कोशिश की गई है।

    साल 2014–15 में, भारत में हायर एजुकेशन में लगभग 3.42 करोड़ छात्र एनरोल थे, जिनमें से 1.57 करोड़ महिलाएं थीं। 2023–24 तक, कुल एनरोलमेंट बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया, जबकि महिलाओं का एनरोलमेंट बढ़कर 2.24 करोड़ हो गया। दूसरे शब्दों में, जहां कुल एनरोलमेंट में लगभग 31.5% की बढ़ोतरी हुई, वहीं महिलाओं के एनरोलमेंट में काफी तेज़ी से 42.2% की बढ़ोतरी हुई। लेकिन, महिला शिक्षकों के तौर पर रोल मॉडल की कमी होने या नहीं मिल पाने से छात्राओं का रुझान एजुकेशन फील्ड में कॅरियर बनाने को लेकर कम ही दिखता है।

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    उदाहरण के तौर पर हम साल 2023-24 में हायर एजुकेशन में फैकल्टी (Faculty in Higher Education) के आंकड़ों को देख सकते हैं। 2023–24 में भारत में लगभग 17.32 लाख फैकल्टी सदस्य थे, जिनमें से लगभग 44.9% यानी 7.78 लाख महिलाएं थीं। फिर भी, प्रोफेसर के स्तर पर स्थिति पूरी तरह बदल जाती है: 1.06 लाख पुरुष प्रोफेसरों की तुलना में लगभग 44,000 महिला प्रोफेसर थीं।

    और सबसे ऊंचे स्तर पर, यह असंतुलन बहुत साफ़ दिखाई देता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में केवल 7% महिला वाइस-चांसलर हैं।

    भारतीय उच्च शिक्षा में यह विरोधाभास ही है कि महिलाएं भागीदारी के मामले में बराबरी के करीब पहुंच रही हैं, लेकिन सत्ता या अधिकार के मामले में वे बराबरी से अभी भी बहुत दूर हैं। इसका सबसे खास उदाहरण इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (IIT) से मिलता है।

    भारत में 23 आईआईटी हैं। अभी इनमें से किसी के भी प्रमुख पद पर कोई महिला नहीं है। और भी हैरानी की बात यह है कि भारत में मौजूद इन 23 आईआईटी में से किसी में भी कभी कोई महिला डायरेक्टर भी नहीं रही है। सन् 1951 में आईआईटी खड़गपुर की स्थापना हुई थी। आज सात दशक से ज़्यादा समय बीतने के बाद भी, आईआईटी को अपनी पहली महिला डायरेक्टर का इंतज़ार है। अपवाद के रूप में डॉ. प्रीति अघलायम IIT मद्रास के ज़ांज़ीबार कैंपस की प्रमुख हैं। हालांकि यह कैंपस देश के बाहर है जो देश के अंदर मौजूद 23आईआईटी में शामिल नहीं है।

    31 नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT) में से, अभी सिर्फ़ एक एनआईटी की प्रमुख महिला हैं—NIT तिरुचिरापल्ली की डायरेक्टर डॉ. जी. अघिला। इसका मतलब है कि महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3.2% है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और भी ज़्यादा चौंकाने वाला है। NIT तिरुचिरापल्ली ही वह संस्थान है जहां डॉ. मिनी शाजी थॉमस 2016 में भारत की पहली महिला NIT डायरेक्टर बनी थीं। आंकड़ों के अनुसार, किसी भी दूसरे एनआईटी में कभी कोई महिला डायरेक्टर नहीं रही है।

    तो, भारत के बेहतरीन इंजीनियरिंग संस्थानों के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक में, महिला नेतृत्व असल में सिर्फ एक कैंपस तक ही सीमित रहा है।

    इससे एक मुश्किल सवाल उठता है: अगर इंजीनियरिंग के एकेडमिक क्षेत्र में पहले से ही महिलाएं मौजूद हैं, तो डायरेक्टर-लेवल की नियुक्तियों के समय लीडरशिप में शामिल होने में समस्या क्यों हो जाती है?


    ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) से पता चलता है कि एक अलग नतीजा भी मुमकिन है। भारत के टॉप इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के बीच का अंतर काफी कुछ सिखाने वाला है। डेटा में शामिल 20 चालू AIIMS संस्थानों में से चार की कमान अभी महिलाओं के हाथों में है। हालांकि महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ज़्यादा होती हैं, फिर भी यह प्रतिनिधित्व सिर्फ़ 20% ही है।

    इन लीडर्स में एम्स ऋषिकेश की प्रो. मीनू सिंह, एम्स गोरखपुर की मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता, AIIMS बीबीनगर हैदराबाद की प्रो. अमिता अग्रवाल और एम्स रायबरेली की प्रो. अमिता जैन शामिल हैं। ये नियुक्तियां भी हाल की ही हैं: इन चारों ने 2022 के बाद से अपनी मौजूदा लीडरशिप भूमिकाएं संभाली हैं, और कई नियुक्तियां 2025 में की गई हैं।

    महिलाओं का ऊंचे पदों तक पहुंचना इसलिए नामुमकिन नहीं है कि काबिल उम्मीदवार नहीं हैं। कई विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि चयन और खोज समितियों में पुरुष प्रधानता के कारण महिलाओं के प्रशासनिक अनुभव को कम आंका जाता है। वहीं कुछ का यह भी मानना है कि सीनियर लेवल पोस्ट पर महिलाओं की संख्या कम होने से नई महिला शिक्षकों को उचित मार्गदर्शन और प्रेरणा नहीं मिल पाती।

    इंजीनियरिंग संस्थानों की तुलना में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) का प्रदर्शन बेहतर

    हालांकि संस्थागत सिस्टम बहुत अलग नतीजे दे सकते हैं। लॉ यूनिवर्सिटीज बेहतर प्रदर्शन करती हैं—लेकिन फिर भी वे पूरी तरह सफल नहीं हो पातीं।

    इंजीनियरिंग संस्थानों की तुलना में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ (NLUs) का प्रदर्शन भी बेहतर है। जिन 27 NLUs को शामिल किया गया, उनमें से पांच की कमान अभी महिलाओं के हाथों में है, जो कुल संख्या का 18.5% है। इनमें NLU जोधपुर की प्रो. हरप्रीत कौर, HPNLU शिमला की प्रो. प्रीति सक्सेना, RPNLU प्रयागराज की सीनियर प्रो. उषा टंडन और सिक्किम NLU की प्रो. अचिना कुंडू शामिल हैं, साथ ही NLU मेघालय में एक इन-चार्ज वाइस-चांसलर भी हैं।

    भारत की 56 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में से 49 के नेतृत्व की पुष्टि हो सकी; इनमें से आठ की यानी 16.3% की कमान महिलाओं के पास थी। इस सूची में भारत की कुछ सबसे प्रमुख यूनिवर्सिटीज़ की महिला प्रमुख शामिल हैं, जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रो. नईमा खातून, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की प्रो. शांतिश्री डी. पंडित, IGNOU की प्रो. उमा कंजिलाल और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की प्रो. संगीता श्रीवास्तव।

    लेकिन इस आंकड़े को भी ठीक से समझने की ज़रूरत है। आठ में से तीन महिलाएँ 'इन-चार्ज' या अंतरिम भूमिका में काम कर रही थीं, न कि पक्के तौर पर पूरे कार्यकाल के लिए नियुक्त थीं। हाल ही में AIU की एक स्टडी में दावा किया गया है कि भारत की सिर्फ़ 7% यूनिवर्सिटीज़ में महिलाएँ वाइस-चांसलर हैं।

    भारत में महिलाओं के लिए नीतियों की कोई कमी नहीं है। यह कहना भी गलत होगा कि भारत ने जेंडर इक्विटी (लैंगिक समानता) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया है। इसके लिए पहले से ही काफ़ी हद तक पॉलिसी का ढांचा मौजूद है।

    IITs में महिलाओं की अंडरग्रेजुएट भागीदारी बढ़ाने के लिए 'सुपरन्यूमरेरी सीटें' शुरू की गई थीं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने STEM संस्थानों में जेंडर इक्विटी (लैंगिक समानता) की जांच के लिए 'एथेना स्वान' (Athena SWAN) फ्रेमवर्क पर आधारित GATI पहल शुरू की। NEP 2020 में 'जेंडर इंक्लूजन फंड' का प्रावधान है। संस्थानों के लिए यह ज़रूरी है कि वे यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने वाले फ्रेमवर्क के तहत 'आंतरिक शिकायत समितियां' बनाएं। NAAC एक्रेडिटेशन में भी जेंडर इक्विटी की पहलों और महिलाओं के लिए लीडरशिप प्रोग्राम्स पर ध्यान दिया जाता है।

    नीतियां अब इस बात पर ज़्यादा ध्यान दे रही हैं कि महिलाएं संस्थानों में आएं, वहां बनी रहें और पूरी तरह से भागीदारी करें। लीडरशिप के आंकड़े बताते हैं कि इस बात पर बहुत कम ध्यान दिया गया है कि जब वे महिलाएं लेक्चरर से प्रोफेसर, प्रोफेसर से डीन और डीन से डायरेक्टर या वाइस-चांसलर बनने की कोशिश करती हैं, तो क्या होता है।

    असली जेंडर गैप संस्थान में आने के बाद शुरू होता है। कुल मिलाकर जो तस्वीर सामने आती है, उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।

    फैकल्टी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 45% है, फिर भी प्रमुख सरकारी संस्थानों में लीडरशिप के पदों पर उनकी भागीदारी IITs में 0% से लेकर AIIMS में 20% तक है। आंकड़ों के अनुसार, NITs में यह 3.2%, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 16.3%, NLUs में 18.5% और AIIMS में 20% है।

    उच्च शिक्षा में महिला सहायक प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से कम है, और एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर जैसे अधिक उन्नत पदों के लिए यह अनुपात और भी कम हो जाता है। पूरे भारत के स्तर पर, 44.41 फीसदी सहायक प्रोफेसर महिलाएं हैं, लेकिन 2021-22 में एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर ये संख्या घटकर क्रमशः 37.85 फीसदी और 29.52 फीसदी हो गई है।

    हायर एजुकेशन सिस्टम में क्या योग्य महिलाएं मौजूद हैं?

    सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि क्या योग्य महिलाएं मौजूद हैं। सवाल यह भी है कि संस्थान लीडर्स की पहचान कैसे करते हैं, सर्च और सिलेक्शन कमेटियां कैसे बनती हैं, किसके एडमिनिस्ट्रेटिव अनुभव को मान्यता मिलती है, किसे डिपार्टमेंट हेड और डीन बनने के मौके मिलते हैं, और संस्थान के नेटवर्क नियुक्तियों को कैसे प्रभावित करते हैं।

    अब एकेडमिक वर्कफोर्स में महिलाओं की एक बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए, अगले सुधार में सिर्फ़ यह नहीं देखना चाहिए कि कैंपस में कितनी महिलाएं आ रही हैं।

    आंकड़े बताते हैं कि भारत में एकेडमिक 'ग्लास सीलिंग' (तरक्की में आने वाली अदृश्य बाधा) अब मुख्य रूप से यूनिवर्सिटी के गेट पर नहीं है। बड़ी संख्या में महिलाएं उस गेट को पार कर चुकी हैं। अब यह 'ग्लास सीलिंग' संस्थान के अंदर है। हालांकि हम महिला आरक्षण बिल, पितृसत्ता को खत्म करने आदि की बात करते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत शिक्षा और एकेडमिक जगत से होनी चाहिए। क्या हम ऐसा कर सकते हैं?